Home देश अमेरिका के शरण में आया सीरिया,आखिरकार ले लिया ये बड़ा फैसला

अमेरिका के शरण में आया सीरिया,आखिरकार ले लिया ये बड़ा फैसला

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सीरिया में चल रहे गृहयुध्द में इस देश को तहस नहस कर दिया है.सीरिया में अब स्थिति कुछ हद तक बदलने की सम्भावना है. यहाँ बशर अल असद की सरकार विद्रोहियों द्वारा कब्ज़ा किये गए कुछ इलाको पर कब्ज़ा पाने में कामयाब हो रही है.और सरकार अब इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के खिलाफ जुट गयी है.

सीरियाई सरकार के समाचार पत्र अल-वतन ने गुरुवार को बताया की आईएसआईएस (ISIS) आतंकवादियों से दमिश्क के दक्षिण में नियंत्रित एक एन्क्लेव को वापस लेने के लिए सीरिया ने ४८ घंटे का समय दिया है. “अगर वे इससे इनकार करते हैं, तो सेना और सहायक बल क्षेत्र में संगठन की उपस्थिति को समाप्त करने के लिए एक सैन्य अभियान शुरू करने के लिए तैयार हैं.” यहाँ के लोग लाखों की संख्या में मर चुके है. कई लोग विस्थापित हुए है तो कई देश छोड़ कर निकल गए है. सीरिया में बशर अल असद के राष्ट्रपति चुने जाने के विरोध में यह के लोग रास्तो पर उतर आये थे. इसके खिलाफ सीरियाइ सरकार ने बल का प्रयोग किया और इस आन्दोलन ने हिंसा का मोड़ ले लिया. मार्च २०११ में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था.

इसी बिच इस्लामिक स्टेट का देश के कुछ हिस्सों पर कब्ज़ा हों शुरू हुआ. सीरिया की सरकार और सैन्य बालो ने इस्लामिक स्टेट (ISIS) के आतंकियों को भी यहाँ से निकल जाने के लिए चेतावनी दी है. जिहादी-नियंत्रित क्षेत्र फिलीस्तीनी शरणार्थी शिविर और दमिश्क के दक्षिण में अल-हाजर अल-असवाड़ क्षेत्र के आसपास केंद्रित है. यह क्षेत्र पूर्वी घौता क्षेत्र से बहुत छोटा है जहां सीरियाई सरकार ने हाल ही में विद्रोहियों को हराया दिया था. क्षेत्रीय सैन्य गठबंधन में एक कमांडर जो सीरियाई सरकार का समर्थन करता है, ने कहा कि सीरियाई सेना ने मंगलवार को जिहादीयों के खात्मे के लिए हमले की तैयारी शुरू कर दिया है. साल २०११ में सीरियाई युद्ध के शुरू होने से पहले, दमिश्क के केंद्र से लगभग ८ किमी यर्मोक, सीरिया के सबसे बड़े फिलिस्तीनी शरणार्थी समुदाय का घर था.

हालांकि अधिकांश निवासियों ने भाग लिया है, जहां हज़ारों शरणार्थी रहते हैं. सीरियाई सरकार ने रूस और ईरान द्वारा समर्थित घेराबंदी और क्रूर सैन्य हमलों के वर्षों के बाद उन्हें देश के अन्य विद्रोही हिस्सों में छोड़कर विद्रोहियों से क्षेत्र के स्वैच्छिक बरामद किए हैं. २०११ के बाद सीरिया की सेना ने बड़ी फूट का सामना किया है. उसी से टूटकर बागियों की फ्री सीरियन आर्मी बनी है. वहीं सीरिया की सेना को नेशनल डिफेंस फोर्स जैसे बहुत सारे असद समर्थक मिलिशिया गुटों का समर्थन प्राप्त है. फ्री सीरियन आर्मी असद के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शनों से जन्मी है. अन्य जिहादी गुटों के साथ मिल कर वह राष्ट्रपति बशर अल असद को सीरिया की सत्ता से बाहर करना चाहती है. इसे तुर्की और अमेरिका का भी कुछ समर्थन मिला है, लेकिन बार बार पराजय से इसका मनोबल टूटा है.

इसके बहुत से सदस्य अब आतकंवादी गुटों में शामिल हो गए है. क्षेत्र में जारी उथल पुथल का फायदा उठा कर आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने साल २०१४ में सीरिया और इराक के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है. बर्बरता के लिए बदनाम यह संगठन अपनी खुद की “खिलाफत” कायम करना चाहता है. काले झंडे के तले यह संघटन कत्लेआम और लोगों को प्रताड़ित करता है. आईएस के अलावा यहाँ और कई जिहादी गुट भी सीरिया में लड़ रहे हैं. इनमें अल कायदा से जुड़े अल नुसरा फ्रंट का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. अल नुसरा आईएस के साथ साथ असद और उदारवादी बागियों से भी लड़ रहा है. जनवरी २०१७ में उसने कई जिहादी गुटों को मिलाकर तहरीर अल शाम के नाम से गुट भी बनाया है

रूस सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद का करीबी मित्र बन कर उसके साथ खड़ा रहा है. रूस आधिकारिक तौर पर सितंबर २०१५ में सीरिया की लड़ाई में शामिल हुआ है. इससे पहले वह सीरिया को हथियारों की आपूर्ति कर रहा था. रूस को कई बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना झेलनी पड़ी है क्योंकि उसके हवाई हमलों में भरी संख्या आम लोग भी मारे गए हैं. अमेरिका और नाटो देशों ने सीरिया के संघर्ष में अपने सैनिक जमीन पर नहीं उतारे थे. किन्तु साल २०१४ के आखिर में अमेरिका के नेतृत्व में जर्मनी समेत ६० अन्य देशों के गठबंधन ने आईएस और अन्य आतकंवादी गुटों के ठिकानों पर हवाई हमले शुरू किए. सीरिया के पड़ोसी देश भी इस संकट में शामिल हो गए है क्योंकि वे अपनी सीमाओं पर सुरक्षा चाहते हैं.

अमेरिकी गठबंधन में शामिल हुआ तुर्की असद का विरोधी है और उदार विद्रोहियों को समर्थन देता रहा है. सीरिया में जारी इस लड़ाई को सात साल पूरे हो चुके हैं लेकिन इसका कोई हल नजर नहीं आ रहा. अलग अलग समूहों और गुटों का देश पर नियंत्रण है. सीरिया के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में कई बार वार्ता हो चुकी है, लेकिन अभी तक कुछ हासिल नहीं हुआ है. आए दिन सीरिया के मोर्चों से तबाही और त्रासदियों के मंजर सामने आते हैं. सऊदी अरब इस्लामिक स्टेट को भी असद के ख़िलाफ़ मदद पहुंचा रहा है. सीरिया में तुर्की भी असद के विरोधियों को मदद पहुंचा रहा है.संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि पिछले पांच सालों में कम से कम सीरिया में तिन लाख लोग मारे जा चुके हैं.

अगस्त २०१५ के बाद से यूएन ने मरने वालों की संख्या को अपडेट करना बंद कर दिया है. ५० लाख लोग जिसमें ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल हैं उन्हें सीरिया छोड़ भागना पड़ा. सीरिया संकट के कारण कई देश शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहे हैं. सीरिया युद्ध कब ख़त्म होगा यह किसी को पता नहीं है.
ईरान के बारे में कहा जाता है कि उसने सीरिया में अरबों डॉलर खर्च कर असद सरकार को बचाने में मदद की है. ईरान ने सीरिया को सैन्य मदद के साथ कई तरह की मदद की है. यह भी कहा जा रहा है. कि सीरिया में ईरान ने सैकडों लड़ाके भेजे. अमरीका कहना है कि सीरिया को तबाह करने के लिए असद जिम्मेदार हैं. इस बीच अमरीका ने फिर सीरिया पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं.