Home विदेश इस मुस्लिम देश पर अचानक ही हुआ ब्लास्टिक मिसाइल से हमला

इस मुस्लिम देश पर अचानक ही हुआ ब्लास्टिक मिसाइल से हमला

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सऊदी अरब और ईरान लम्बे समय से आमने सामने रहे है. लेकिन अब इन दो देशो में तनाव काफी बढ़ रहा है. पिछले कुछ दिनों से यहाँ के हालात और भी गंभीर हो चुके है. यह दोनों ही देश काफी ताकतवर है और इन दोनों में क्षेत्रीय प्रभुत्व पर लड़ाई चल रही है. इसी बिच यमन के विद्रोहियों ने दावा किया है कि उन्होंने रविवार को सऊदी अरब पर बैलिस्टिक मिसाइल से हमला किया था. और इस हमले में निशाने पर राजधानी रियाद भी थी. विद्रोहियों के बयान के मुताबकि, इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गयी है.

सऊदी अरब की सेना का कहना है कि उसने सात मिसाइलों को अपने कब्जे में ले लिया है. इन सात में से से तीन को रियाद की ओर लक्षित किया गया था. रियाद में रात में आकाश में लाल मिसाइल ट्रेल्स दिखाई दे रहे थे. प्रसार माध्यमो पर प्रसारित किए जा रहे वीडियो में देख सकते है कि संभवतः एक पैट्रियट मिसाइल को आने वाली विद्रोहियों की आग को रोकने के लिए भेजा जाता है. इसके लॉन्च होने के थोड़ी देर बाद इसे जमीन पर क्रैश कर दिया जाता है.
पिछले तीन वर्षों से हूती नामक एक चर्चित विद्रोही समूह सऊदी अरब के क्षेत्र में बेलिस्टिक मिसाइल से हमला करा रहा है. हूती विद्रोही साल २०१५ से यमन सरकार का समर्थन करने वाली सऊदी अरब की नेतृत्व वाली गठबंधन सेना से संघर्ष कर रहे हैं.

सऊदी अरब और अमेरिका ने ईरान पर हूती विद्रोहियों को हथियार मुहैया कराने का आरोप लगाया है. लेकिन इन आरोपों को ईरान हमेशा ही झूठा बताता आया है. रविवार २५ मार्च को यहाँ लगातार एक के बाद एक हमले किए गए. ओं हमलो में दक्षिण-पश्चिमी सऊदी अरब के शहरों को निशाना बनाया गया. तो वहीं यमन से सटी सीमा और राजधानी रियाद पर भी हमला किया गया है. यमन में सऊदी नेतृत्व वाली गठबंधन हस्तक्षेप की तीसरी वर्षगांठ पर यह हमला हुआ है. इस गठबंधन में संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल है. संयुक्त अरब अमीरात की मानवाधिकार समूह ने हवाई अभियान चलाने के लिए निंदा की है. यह वह अभियान है जिसके तहत हवाइ हमले में हजारों यमन के नागरिकों की जान चली गई थी. यह हमला एक विशाल मानवीय संकट का कारण बना.

संयुक्त राज्य अमेरिका इस गठबंधन को सैन्य और खुफिया सहायता प्रदान करता है. या विवाद दशकों पुराना है और इस विवाद के पीछे का कारण धार्मिक मतभेद है. दोनों देश इस्लाम के अलग-अलग पंथ को मानते हैं. ईरान में ज़्यादातर शिया मुसलमान हैं और सऊदी अरब ख़ुद को एक सुन्नी मुस्लिम शक्ति के रूप में देखता है. यह धार्मिक फूट कुछ अन्य खाड़ी देशों में भी देखी गयी है जहां सुन्नी और शिया मुसलमान हैं. कुछ देश समर्थन के लिए ईरान की तरफ़ देखते हैं और कुछ सऊदी अरब की तरफ़. सऊदी अरब अपने आप को मुस्लिम दुनिया का नेता मानता रहा है. लेकिन साल १९७९ में ईरान में इस्लामिक क्रांति ने इसे चुनौती दे दी है. इसने इस क्षेत्र में एक नए प्रकार के राज्य का निर्माण किया- एक धर्मतंत्र.

इस नामुने का लक्ष्य था सीमाओं से आगे फैलाना. साल २०११ में अरब जगत के कई अलग अलग हिस्सों में कुछ आंदोलन हुए जिसके कारण उनमे राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई है. ईरान और सऊदी अरब ने सीरिया, बहरीन और यमन जैसे देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इस मौके का फ़ायदा उठाया. यह विवाद वक़्त के साथ बढ़ता जा रहा है क्योंकि कई मायनों में ईरान यह क्षेत्रीय लड़ाई जीतने की संभावनाए बढ़ रही है. सीरिया में ईरान और रूस ने राष्ट्रपति बशर-अल-असद को समर्थन दे दिया है जिससे सऊदी अरब के समर्थन वाले विद्रोही गटों को यहाँ से हटाने में कामयाबी मिली है. सऊदी अरब में इरान का काफी प्रभाव है और सऊदी अपने देश में ईरान के इस प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश कर रहा है.

सऊदी अरब के क्राऊन प्रिंस ने यमन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी है ताकि ईरान का प्रभाव कम हो सके लेकिन सऊदी की यह कोशिश तीन साल के बाद भी नाकामयाब साबित हुई है. सऊदी अरब को अमेरिका का समर्थन मिला है. इसराइल को इरान की तरफ से खतरा है. इजराइल ईरान को रोकने के लिए सऊदी अरब का समर्थन कर रहा है.इसराइल को सीरिया बार्डर के पास कब्ज़ा जमाए हुए ईरान समर्थक योध्दाओ से डर है. इसराइल और सऊदी अरब ने मिलकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने वाले साल २०१५ के अंतर्राष्ट्रीय समझौते का विरोध किया था. उनका कहना था की यह कदम ईरान को बम प्राप्त करने से रोकने के लिए काफी नहीं है. ईरान और सऊदी अरब सीधे नहीं लड़ते है. दोनों देश प्रतिनिधिक रूप से लड़ाई कर रहें हैं.