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गुस्से में पुतिन, रूस किसी भी समय इस देश पर आक्रमण कर सकता है

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रूस को आज दुनिया में महाशक्ति के रूप में देखा जाता है.  अगर कुटनीतिक नजरिये से देखा जाये तो रूस सबसे मजबूत स्थिति में है.रूस की इस शातिर कूटनीति की वजह है रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन. रूस क्षेत्रफल के अनुसार दुनिया का सबसे बड़ा देश है. साल १९९१ से पहले रूस को सोवियत यूनियन कहा जाता था. यह कई देश मिलकर बना था. लेकिन बाकि देशो की कूटनीति की वजह से यह देश १९९१ में अलग हो गए. सोवियत यूनियन के टूटने के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बन गया. लेकिन रूस ने भी अपनी ताकत और तेजी से बढ़ाना शुरू किया.

रूस ने अपनी स्थिति इतनी मजबूत बना ली है की अमेरिका जैसा देश भी उससे डरता है. साल २०१८ के पहले ३ ही महीनो में दुनिया की राजनीति में दो बड़ी बातें हुई हैं. एक चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी चिनपिंग का ताउम्र राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ गया है. तो वही दूसरी तरफ व्लादिमीर पुतिन चौथी बार रूस का राष्ट्रपति चुने गए है. भारत और चीन के बीच संबंध सरल नहीं हैं. किन्तु रूस के साथ भारत के रिश्ते बहुत सफ़र रहे हैं. जिन हालातों में पुतिन रूस के राष्ट्रपति चुने गए हैं उससे आम रूसि लोगों को लगता है कि उन्होंने दुनिया में रूस की नाक फिर से ऊंची कर दी है. पुतिन अपने देश में बहुत ही चाहिते है और रूस की जनता उनका पूरी तरह समर्थन करती है.

राष्ट्रपति पुतिन की इस बार की जीत रूस की आर्थिक मजबूती की दिशा और दशा भी दर्शाती है. रूस के लोग उन्हें मैन ऑफ एक्शन भी कहते हैं. व्लादिमीर पुतिन पहले रूस के राष्ट्रपति बने फिर प्रधानमंत्री और फिर से राष्ट्रपति, उसमें भी उन्होंने अपनी जीत को दोहराया है. यह वाकई पुतिन की शख्सियत का ही कमाल है. दुनिया के सबसे बड़े क्षेत्रफल वाला देश है रूस और यहाँ फिलहाल पुतिन का ही दबदबा कायम है. यह भी कहा जाता है कि चुनाव में जो लोग उनके खिलाफ खड़े होते हैं वे केवल दिखावे के लिए खड़े होते हैं. और इस बार के परिणाम के बाद भी ऐसी चर्चा यहाँ के लोगो में आम थी. चुनाव में तमाम अनियमितताओं और गलत तौर-तरीकों के आरोप भी उन पर लगाये गए हैं.

लेकिन इन सब बातों से वे बेपरवाह है. पुतिन रूस के एक ऐसे लौह नेता बन चुके हैं जिनके इर्द-गिर्द शायद कोई नहीं है. पुतिन का बीते १८ सालों का यह सफ़र भी रोचक है.पुतिन की आयु आज ६५ वर्ष है. पुतिन ने दुनिया को रूस की ताकत दिखलाने से कभी भी कोई कमी नाइ छोड़ी है और न ही दुनिया से अपनी छाप छुपाई है. कई सालो तक अमेरिका और नाटो रूस को नजरअंदाज करते रहे. लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब अमेरिका में २०१६ में हुए राष्ट्रपति चुनाव में रूस पर दखल देने का आरोप लगा. पुतिन की एक खासियत यह भी है कि वे जूडो में ब्लैक बेल्ट हैं और उस प्रशिक्षण की आक्रामकता उनके तेवर में भी झलकती है. वे दुनिया के इकलौते ब्लैक बेल्ट धारक राष्ट्रपति है.

अक्टूबर २०१५ में पुतिन ने कहा था कि ५० साल पहले लेनिनग्राद की सड़कों ने मुझे एक नियम सिखाया था कि अगर लड़ाई होनी तय है तो पहला पंच मारो. साल १९९७ में पुतिन रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन की सरकार में शामिल हो गए थे. जबकि साल १९९९ में वे स्वयं रूस के राष्ट्रपति बन गए. उसके बाद साल २००४ में वे दोबारा से रूस के राष्ट्रपति चुने गए. रूस के संविधान में तीसरी बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का प्रावधान नहीं था. ऐसे में वे वहां के प्रधानमंत्री बने. फिर रूसी संविधान में संशोधन और कई बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता भी उन्होंने साफ कर दीया. यही वजह है कि साल २०१२ में वे तीसरी बार राष्ट्रपति बने और अब चौथी बार इसी पद पर चुने गए है.

रूस पर इतने लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद भी लोग पुतिन को पसंद कर रहे हैं. लेकिन बाकि दुनिया में इन दिनों रूस को संशय की दृष्टि से देखा जा रहा है. पिछले दिनों हुई एक घटना के बाद दुनिया के कई देश रूस के राजनयिकों को अपने देश से बाहर निकाल रहे हैं. यह सिलसिला बीते १७ मार्च कोइंग्लैंड ने शुरू किया था. अमेरिका ने भी अपने देश में मौजूद ६० राजनयिकों को देश छोड़ने का आदेश दे दिया है. फ्रांस, जर्मनी, पोलैंड, चेक गणराज्य समेत डेनमार्क, स्पेन और इटली आदि ने भी रूसी राजनयिकों को बाहर कर दिया है. दुनिया के तमाम देशों का विश्वास रूस पर से फिलहाल डगमगाया है. लेकिन भारत और रूस के संबंधो में परंपरागत और नैसर्गिकता का भाव कायम रहा है.

एक समय ऐसा था जब दुनिया दो गुटों में बट चुकी थी. जिसमें एक गुट संयुक्त राज्य अमेरिका का था और दूसरा सोवियत संघ का था. उस वक़्त भारत ने इन दोनों से अलग तठस्थ रहने की राह अपनाई थी. हालांकि आर्थिक उदारीकरण और बदली दुनिया के अंदाज को देखते हुए आज यह पथ तुलनात्मक रूप से कुछ चिकना हुआ है, पर बदला नहीं है. भारत के दुनिया के अनेक देशों के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव रहे हैं. किन्तु रूस के साथ भारत का नाता कभी भी उलझन वाला नहीं रहा. पिछले वर्ष जब रूस ने पाकिस्तान के साथ मिलकर युद्धाभ्यास करने का इरादा जताया था तब यह बात भारत को बहुत खली थी. यह चर्चा भी हो रही थी कि भारत का नैसर्गिक मित्र रूस ऐसे कैसे कर सकता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में अमेरिका और भारत के बीच संबंध कहीं अधिक गहरे हुए हैं. प्रधान मंत्री मोदी ने कूटनीतिक संतुलन को बरकरार रखते हुए रूस के साथ अपनी पुरानी दोस्ती को बरकरार रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू रूस की समाजवादी विचारधारा से बहुत ही प्रभावित थे. समाजवाद की प्रेरणा से ही भारत की अर्थव्यवस्था मिश्रित है, जिसमें पूंजीवाद के साथ समाजवाद और लोक के साथ निजी का समावेशन भी है. भारत और रूस के द्विपक्षीय संबंध न केवल ऐतिहासिक हैं, बल्कि आर्थिक तथा वैज्ञानिक दृष्टि से कहीं अधिक समृध्द भी रहे हैं. और यह सिलसिला बना हुआ है. अमेरिका के साथ कुछ हद तक कम हुआ उसका संघर्ष समय समय के बाद सतह पर आता रहता है. उत्तर कोरिया के मामले पुतिन को न सिर्फ चीन को साधना है, बल्कि जापान और दक्षिण कोरिया के भी भरोसे पर खरा उतरना है ब्रिटेन में कथित रूप से हुए रासायनिक हमले को लेकर भी विवाद बढ़ रहा है. और यह भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती है.