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चीन के दादागिरी से तंग आकर अब भारत में शामिल होने को तैयार है ये देश

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चीन हमेशा ही किसी ना किसी सीमा विवाद में उल्ज़ा रहता है. चीन की आदत है दुसरे देशो की ज़मीन पर अपना हक़ बताना और कब्ज़ा करने की कोशिश में लगे रहना.

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तिब्बत एशिया का ऐसा एक क्षेत्र है जिसकी भूमि मुख्यतः उच्च पठारी है. इसे पारम्परिक रूप से बोड या भोट भी कहा जाता है. इसके प्रायः सम्पूर्ण भाग पर चीन जनवादी गणराज्य का अधिकार है जबकि तिब्बत सदियों से एक पृथक देश के रूप में रहा है. यहाँ के लोगों का धर्म बौध्द धर्म की तब्बती बौध्द शाखा है तथा इनकी भाषा तिब्बती भाषा है. चीन द्वारा तिब्बत पर चढ़ाई के समय से याने १९५५ से वहाँ के राजनैतिक व धार्मिक नेता दलाई लामा ने भारत में आकर शरण ली और वे अब तक भारत में सुरक्षित हैं. भारत के तिब्बत के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक सम्बंध अत्यन्त प्राचीन हैं. तिब्बत को विश्व की छत कहा गया है. राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा है.

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इतिहास के अनुसार तिब्बत को दक्षिण में नेपाल से कई बार युद्ध करना पड़ा और नेपाल ने इसको हराया. नेपाल और तिब्बत की सन्धि के मुताबिक तिब्बत ने हर साल नेपाल को ५००० नेपाली रुपये हरज़ाना भरना पड़ा. इससे आजित होकर नेपाल से युद्ध करने के लिये तिब्बत ने चीन से सहायता माँगी. चीन के सहायता से उसने नेपाल से छुटकारा तो पाया लेकिन इसके बाद 1906-7 में तिब्बत पर चीन ने अपना अधिकार बनाया और याटुंग ग्याड्से एवं गरटोक में अपनी चौकियाँ स्थापित की. 1912 में चीन से मांछु शासन के अंत होने के साथ ही तिब्बत ने अपने आप को पुन: स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया. सन 1913-14 में चीन, भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों की बैठक शिमला में हुई जिसमें इस विशाल पठारी राज्य को भी दो भागों में विभाजित कर दिया गया.

क्‍या सोचते हैं विशेषज्ञ

सन 1933 में 13वें दलाई लामा की मृत्यु के बाद से बाह्य तिब्बत भी धीरे-धीरे चीनी घेरे में आने लगा. चीनी भूमि पर लालित-पालित 14 वें दलाई लामा ने 1940 में शासन भार सँभाला. 1950 में जब ये सार्वभौम सत्ता में आए तो पंछेण लामा के चुनाव में दोनों देशों में शक्तिप्रदर्शन की नौबत तक आ गई और चीन को आक्रमण करने का बहाना मिल गया. 1951 की संधि के अनुसार यह साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया. इसी समय से भूमिसुधार कानून एवं दलाई लामा के अधिकारों में हस्तक्षेप एवं कटौती होने के कारण असंतोष की आग सुलगने लगी जो क्रमश: 1956 एवं 1959 में जोरों से भड़क उठी. परन्तु बलप्रयोग द्वारा चीन ने इसे दबा दिया. अत्याचारों, हत्याओं आदि से किसी प्रकार बचकर दलाई लामा नेपाल पहुँच सके.

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अभी वे भारत में रहकर चीन से तिब्बत को अलग करने की कोशिश कर रहे हैं. अब सर्वतोभावेन चीन के अनुगत पंछेण लामा यहाँ के नाममात्र के प्रशासक हैं. चीन के अपने ही लोगो ने अब उसे जैसे थप्पड़ मार दिया है. तिब्बत के लोगो ने चीन के खिलाफ प्रादर्शन किया है. लोगों का कहना है की वह चीन के हिटलर जैसे राज से तंग आ चुके है. उनका कहना है की उन्हें या तो आज़ादी डी जाए या फिर भारत तिब्बत को वापस ले. तिब्बत के एक चौक में इकट्ठे हो कर लोगो ने चीन के खिलाफ नारे लगाये. यहाँ के लोगो का कहना है की चीन तिब्बत पर हिटलर की तरह राज करता है. वे लोग अपनी जिंदगी जीने के लिए आज़ाद नहीं है. चीनी लोग उनपर जुल्म कर रहे है.

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चीन की सरकार यहाँ उगने वाली फसल तक को छीन कर ले जाती है. प्रदर्शनकर्ताओ ने कहा है की वे भारत से मदत के निवेदन करते है. और कहा की यदि भारत तिब्बत को वापस लेने की ओर सोचता है तो हर तिब्बतवासी भारत का सहयोग करेगा. कुछ महीनो पहले हिमाचल की धर्मशाला में भी ऐसा ही प्रदर्शन किया गया था. वहा के लोगो ने इल्जाम लगाया था की बौध्द भिक्षुको को चीन के मठो में अन्दर जाने की इजाजत नहीं दी जा रही है. जो पूरी तरह गलत है. तिब्बतियों को भी समानता से जीने का अधिकार है. और इस तरह उन्हें मठो में जाने से रोका नहीं जा सकता. तिब्बती कांग्रेस शिमला द्वारा, तबेत की आज़ादी को लेकर तिब्बती हड़ताल पर जाने से पीछे नहीं हटेंगे. और तिब्बती लगो के अधिकार के लिए हमेशा लड़ते रहेंगे.

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अब देखना ये होगा की भारत सरकार इस विषय पर क्या प्रतिक्रिया देती है. तिब्बतन महिला संघ की महिलाओं ने सोमवार १२ मार्च को चीन के तिब्बत की जमीन पर कब्जे के खिलाफ जनचेतना रैली निकाली. उन्होंने राष्ट्रीय विद्रोह दिवस मनाया. समुदाय की महिलाओं ने तिब्बत की महिलाओं के बलिदान को याद कर 59वीं वर्षगांठ मनाई. तिब्बतन महिला संघ के नेतृत्व में तिब्बत समुदाय के लोगों ने तिब्बती मार्केट से जनचेतना रैली निकाली. जो लैंसडौन चौक, बुद्धा चौक, कनक चौक होते हुए तिब्बत मार्केट जा कर समाप्त हुई. इस दौरान समुदाय की महिलाओं ने कहा की साल 1959 में चीनियों ने मिलिट्री बल से तिब्बत की जमीन पर कब्जा किया था. इसके विरोध में अब तक सैकड़ों तिब्बती लोग बलिदान दे चुके हैं. उन्होंने चीन के खिलाफ रैली निकाल कर राष्ट्रीय विद्रोह दिवस मनाया.