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फिर चला PM मोदी का जादू UP चुनाव को लेकर सामने आयी ये बड़ी खबर

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देश के अधिकतर राज्यों में आज भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है. जनता ने भा ज पा पर दिखाए इस विश्वास की वजह है प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली. भा ज पा ने अधिकतर राज्यों में बड़ा बहुमत हासिल कर लिया है. किन्तु देश के एक राज्य में भा ज पा को हार का सामना करना पड़ा है. उत्तर प्रदेश और बिहार में ११ मार्च २०१८ को उपचुनाव हुए थे. इस चुनाव के नतीजे १४ मार्च को आये. इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. इस चुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत हुई.

इस चुनाव में हुई जित से भा ज पा के विरोधी पक्ष बेहद खुश है. इस चुनाव के नतीजे खुलने पर मानो विरोधी पार्टीयाँ की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा है. इस जीत का जश्न इन राज्यों में अभी तक मनाया जा रहा है. विरोधी नेता जैसे फुले नहीं समां रहे है. विपक्ष शायद यह भूल रहे है की किस तरह भा ज पा ने देश के अधिकतर राज्यों से अन्य राजकीय पार्टियों का सफाया कर दिया है. वे अपनी ही जीत की खुशिया मनाने में मगन है. लेकिन हाल ही में एक ऐसी खबर सामने आयी है जिससे विपक्ष के जश्न पर कड़ी लगाम लग गयी है. यह खबर है राजस्थान के राज्य सभा चुनाव की. राजस्थान में भा ज पा के ३ उमेद्वारो ने निर्विरोध चुनाव जित लिए है.

राजस्थान में भा ज पा के डॉ. किरोड़ीलाल मेडा, मदनलाल सैनी, और भूपेन्द्र यादव निर्विरोध चुन लिए गए. भा ज पा के इन ३ उमेद्वारो के अलावा किसी भी उमेदवार ने नामांकन पात्र दाखिल नहीं किया था. राजस्थान विधान सभा के सचिव ने बताया है की नामांकन पत्रों की जांच के बाद इन तीनो को निर्विरोध विजयी घोषित किया गया है. यह नत्जिए १५ मार्च को घोषित किये गए जिनसे विपक्ष के होश ऊड गए है. इससे पहले भी भा ज पा ने पूर्वोत्तर कुछ राज्यों में जीत हासिल की है. साथ ही त्रिपुरा में पूर्ण बहुमत हासिल कर इतिहास रच दिया है. और उसके बाद राजस्थान में मिली इस जीत ने विरोधी पार्टियों को चौंका दिया है. और उत्तर प्रदेश और बिहार में मिली इस जीत जो फीका कर दिया है.

मायावती ने एक राज्य सभा टिकेट के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से गटबंधन कर लिया है. यह गटबंधन सिर्फ राजनैतिक फायदे के लिए किया गया एक सौदा है. लेकिन मायावती को एक और विधायक की जरुर पड़ेगी. और यह विधायक है नरेश अगरवाल के बेटे नितिन अगरवाल. यह बात साफ़ है की मायावती का या उनके किसी भी सदस्य का राज्य सभा में पहुँच पाना बहुत ही मुश्किल है. और दूसरी तरf अखिलेश यादव का मकसद था उत्तर प्रदेश और बिहार के चुनाव में जीत हासिल करना, जो की उन्होंने समाजवादी पार्टी से गटबंधन कर के हासिल भी कर लिया है. जिससे यह सम्भावना है की मायावती और समाजवादी पार्टी का यह गटबंधन यही तक का रह जाये और आनेवाले दिनों में यह दोनों फिर अलग हो जाये.