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भारत के लिए मर मिटने वाला ये देश अब नहीं रहा भारत के पास

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भारत और रूस की दोस्ती कई दशको से कायम है. इस दोस्ती के कई पहलु है. भारत और रूस के बीच के संबंध वर्षों से मजबूत रहे हैं. कई मुश्किल हालातों में रूस ने भारत का साथ भी दिया है. जब भी भारत किसी मुसीबत में रहा है, रूस ने उसका साथ दिया. भारत और रूस में भले ही कोई सरकार रही हो सभी ने इन संबंधों को नया आयाम देने की भरपूर कोशिश की है. यह दोनों देशों की विदेश राजनीति का एक अहम हिस्‍सा भी रही है. कश्‍मीर मामले पर भी रूस हमेशा से ही भारत का साथ देता रहा है. लेकिन अब कुछ समय से उसके रुख में बदलाव आता दिखाई दे रहा है.बीते कुछ समय में रूस ने जिस तरह से अपना दायरा भारत के घुर विरोधी पाकिस्‍तान और चीन की तरफ बढ़ाया है.

चीन के बदलते रुख से भारत को भविष्य में कुछ गलत होने की आशंका हो रही है. लेकिन रूस इस आशंका पर कई बार अपना इनकार ज़ाहिर कर चुका है. यदि रूस के संबंध पाकिस्‍तान और चीन से मजबूत होते हैं तो इसका अंजाम भारत को निश्चित रूप से भुगतना ही पड़ेगा. रूस की क्षेत्रीय जरूरत और उसकी प्राथमिकता में हो रहा बदलाव भारत के लिए एक गंभीर समस्‍या बन सकता है. पिछले साल दिसंबर में इस्‍लामाबाद में छह देशों की सदनों के स्‍पीकर की सम्मलेन हुई थी. इस सम्मलेन में रूस समेत चीन, अफगानिस्‍तान, ईरान, तुर्की और पाकिस्‍तान ने भी हिस्‍सा लिया था. इस सम्मलेन में जिस साझेदारी घोषणापत्र पर इन सभी देशों ने हस्‍ताक्षर किए थे उसके अनुसार रूस ने कश्‍मीर मुद्दे पर पाकिस्‍तान की लाइन का समर्थन किया था.

इस घोषणा पत्र में कहा गया था कि भारत और पाकिस्‍तान को जम्‍मू कश्‍मीर के मुद्दे को संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पारित प्रस्‍ताव के द्वारा सुलझाना चाहिए. दुनिया के कई अभ्यासको ने भी इस कूटनीति का अभ्यास किया है. ऑब्‍जरवर रिसर्च फाउंडेशन के प्राध्यापक हर्ष वी पंत भी ऐसा का कहना है कि रूस के लिए पश्चिमी राष्ट्र हर मामले में बहुत बड़ी चुनौती खडी कर रहे है. अमेरिका समेत पश्चिमी देशों को लगता है कि वैश्विक राजनीति में रूस के बराबर विध्‍वंसकारी राजनीति और किसी भी देश ने की नहीं है. उनकी नजर में राजनीति में रूस चीन से भी कहीं आगे है. साल २०१७ रूस और अमेरिका के रिश्‍तों में कई तौर पर तनाव लेकर आया है. वहीं अमेरिका और भारत के बिच के सम्बन्ध इस दौरान मजबूत हुए हैं.

रूस के रुख में हो रहे बदलाव की एक वजह यह भी हो सकती है की भारत और अमेरिका की नजदीकियां उसे पसंद न हो. चीन की हिंद महासागर में लगातार बढ़ रही गतिविधियाँ अब पूरी दुनिया के सामने है. चीन लगातार दक्षिण एशिया में अपने पांव पसार रहा है. वह कई बार भारतीय सीमाओं का उल्‍लंघनभी कर चुका है. इस वजह से भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. इसके साथ ही चीन और पाकिस्‍तान की बढती दोस्‍ती भी भारत के लिए नुकसानदायक रही है. चीन और पकिस्तान इन दिनों हर विषय पर एक दुसरे का समर्थन करते नजर आ रहे है. भारत को इस वजह से परेशानी उठानी पड रही है. चीन ने हमेशा से ही भारत को एक वैश्विक ताकत मानने से इनकार किया.

भारत ने सुरक्षा को लेकर उठाये सवाल और शंकाओं का भी वह साफ़ इनकार करता आया है. लेकिन दूसरी तरफ वह अपनी ताकत को लगातार बढ़ाने में लगा हुआ है. ऐसे में पश्चिम से संघर्ष कर रहे रूस को चीन के रूप में एक नया कूटनीतिक और रणनीतिक साझेदार मिल गया है जो अमेरिका के बारे में उसकी ही तरह से सोच रहा है. प्राध्यापक पंत का मानना है कि रूस का पाकिस्‍तान और चीन के करीब होना भारत और रूस के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है. आने वाले समय में भी इस पर अनिश्‍चितता कायम रहेगी. रूस के विदेश मंत्री सर्गी लैवरोव ने भारत की यात्रा की थी. इस यात्रा के दौरान उन्‍होंने चीन के ओबोर प्रोजेक्‍ट में भारत को साझेदार बनने की सलाह दी थी.

विदेश मंत्री सर्गी ने अमेरिका, भारत, जापान और आस्‍ट्रेलिया द्वारा ओबोर का जवाब देने के लिए बनाए गए प्रोजेक्‍ट पर यह कहते हुए सवाल उठाए थे कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में रुकावट डालकर कुछ हासिल नहीं होने वाला है बल्कि इसके लिए सभी को एकजुट होकर खुले दिमाग के साथ आगे बढ़ने होगा और काम करना चाहिए. पाकिस्‍तान और चीन के संबंध में कही गई उनकी यह बातें भारत को परेशानी में डालनेवाली है. जब भारत और चीन के बीच डोकलाम के मुद्दे पर तनाव सर्वोच्च था और सीमा पर दोनों देशों की सेनाए आमने सामने आ गयी थी, उस वक्‍त रूस ने भारत का समर्थन किया था. लेकिन अब कुछ ही समय में रूस की तरफ से कई मुद्दों पर चुप्‍पी साध लेने से शक का मोहोल पैदा हो गया है.

इतना ही नहीं जब जब अमेरिका और चीन में दक्षिण चीन सागर को लेकरकोई विवाद हुआ है तब भी रूस ने खामोशी बरकरार रखी है. रूस के इस रवईये से यही बात साफ़ होती है की रूस अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, लेकिन चीन का साथ दे रहा है. भारत और रूस के राष्‍ट्राध्‍यक्षों के बीच पिछले वर्ष जून में आखिरी मुलाकात हुई थी. उस वक्‍त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूस की यात्रा पर गए थे. इससे पहले ब्रिक्‍स सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेने के लिए रूसी राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन भारत आए थे. चीनी के राष्ट्राध्यक्ष शी चिनपींग ने पिछले साल नवंबर में वियतनाम में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी. इस दौरान शी चिनफिंग ने कहा था कि चीन और रूस को अपने मूल हितों का रक्षण करने के लिए एक दूसरे का समर्थन करना जारी रखना होगा.

इस मुलाकात के दौरान शी जिनपिंग ने यह भी कहा था कि वह रूस को विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार मानता है. चीन रूस के साथ दोनों देशों के बीच संबंधों के उच्च स्तरीय विकास को आगे बढ़ाना, अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को और मजबूत करना, क्षेत्रीय और वैश्विक शांति, स्थिरता की रक्षा भी करना चाहता है. इसी मौके पर रुसी राष्ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन ने कहा था कि रूस दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक भागीदारी के विकास पर काफी ध्यान देता है. रूस चीन के साथ आर्थिक, ऊर्जा, कृषि, आधारभूत संरचना और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे मज़बूत करना चाहता है. इसके साथ ही रूस चीन के साथ अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मामलों पर सहयोग का विकास, एपेक समेत विभिन्न बहुपक्षीय संगठनों में संपर्क और समन्वय को गहरा करना और एशिया प्रशांत मुक्त व्यापार क्षेत्र के निर्माण को बढाना चाहता है.