Home विदेश ये देश किसी भी समय बन सकता है चीन का गुलाम

ये देश किसी भी समय बन सकता है चीन का गुलाम

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चीन हर तरह से भारत के खिलाफ कूटनीति रचने में लगा हुआ है. उसने दोकलाम सीमा पर भारत की जमीन पर अपने अधिकार बताते हुए अपना सैन्य तैनात कर दिया है. वह क्षेत्रफल अनुसार दुनिया का तीसरा बड़ा देश है. चीन की सीमाएं दुनिया में सबसे ज्यादा देशो से लगती है. चीन का अपने हर पडोसी देश के साथ विवाद जारी है. वह कई देशो की जमीन पर अपना अधिकार बताता आया है. चीन पकिस्तान की हर तरह से मदत कर रहा है. इस मदत के पीछे उसका मकसद है पकिस्तान को भारत के खिलाफ मजबूत बनाना. वह अब मालदीव की तरफ भी बढ़ चूका है.

चीन द्वारा बड़े पैमाने पर मालदीव की जमीन हथियाने की कोशिश को अमेरिका ने चिंताजनक बताया है. पीटीआई से की गयी एक बातचीत में अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के उच्चाधिकारी और डिफेंस फॉर साउथ एंड साउथईस्ट एशिया के उप-सहायक सचिव जोई फेल्टर ने इस बात चिंता की पुष्टि की है. उन्होंने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त बनाए रखना अमेरिका की प्रतिबद्धता है. उनका कहना था की ‘मालदीव में चीन के बढ़ते हस्तक्षेप से हम चिंतित हो रहे है. हम जानते हैं की यह भारत के लिए चिंता का विषय है. यह देखने वाली बात है कि आगे क्या होता है. मौजूदा स्थिति हमें हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की प्राथमिकताओं पर ध्यान देने का संकेत दे रही है.’ उन्होंने कहा कि ड्रैगन का मालदीव को शिकंजे में फंसाना अमरीका और भारत दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

मालदीव में चीन तेजी से पैर पसार रहा है. मालदीव में चीन की दखलअंदाजी भारत के लिए भी चिंता का विषय है. कुछ वक्त पहले मालदीव के एक पूर्व मंत्री ने चीन पर मालदीव में जमीन हथियाने का आरोप लगाया था और कहा था कि अगर इस स्थिति पर काबू नहीं पाया गया तो भारत और अमेरिका दोनों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. पेंटागन के मुख्य अधिकारी जोई फेल्टर ने कहा कि अमेरिका एक स्वतंत्र और खुले इंडिया-पसिफिक नियमों के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन जहां तक चीनी प्रभाव की बात है, मालदीव में चीन की चिंतित करने वाली गतिविधियां देखी गई हैं. अधिकारी ने आगे कहा, ‘यह स्थिति भारत के लिए चिंताजनक है और हमारे लिए भी यह चिंता का विषय है. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो भारत और अमरीका दोनों के लिए यह रणनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है.

मालदीव में चीन का हस्तक्षेप अमेरिका के साथ साथ भारत के लिए भी चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि चीन और भारत के बीच समय-समय पर विवाद होते रहे हैं. मालदीव के साथ भी भारत के संबंधों में उस वक्त तनाव आ गया था, जब वहां के राष्ट्रपति ने फरवरी में मालदीव में आपातकाल घोषित कर दिया था. ऐसे में चीन की मालदीव से निकटता भारत के पसीने छुड़ाने वाली साबित हो सकती है. हाल ही में अमेरिका के दौरे के दौरान मालदीव के पूर्व विदेश मंत्री अहमद नसीम ने आरोप लगाया था कि चीन मालदीव के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है और साथ ही चीन वहां जमीन हथियाने की कोशिश कर रहा है. अहमद नसीम ने यह भी कहा था कि अगर इस पर नजर नहीं रखी गई और कुछ नहीं किया गया तो अमेरिका और भारत दोनों के लिए खतरा पैदा हो जाएगा.

पेंटागन के मुख्य अधिकारी जोई फेल्टर ने कहा है कि हर छोटे-बड़े राज्य के अधिकार तभी पूरे किए जा सकते हैं, जब एक स्वतंत्र और खुले इंडिया-पैसिफिक नियम अपनाएं और नियम आधारित आदेश बनाएं जाएं. हालांकि उन्होंने यह आशंका भी जताई है कि भारत इन चिंताओं को साझा करता भी है या नहीं. भारत और चीन के संबंधों में आए दिन तनाव की स्थिति बनी रहती है. मालदीव में अगर चीन बेस बना लेता है तो चीनी पनडुब्बियां भारत के बेहद करीब तक आ जाएंगी जो भारत की सुरक्षा के लिए यह बड़ा खतरा साबित हो सकता है. पिछले महीने मलदीव में आपातकाल घोषित हो जाने के दौरान भारत के विरोध पर मालदीव ने आपत्ति जताई थी. इसका एक कारण चीन से उसकी बढ़ती करीबी को भी माना गय है.

मालदीव भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण देश है. मालदीव के समुद्री रास्ते से निर्वाध रूप से चीन, जापान और भारत को ईंधन की आपूर्ति होती है. चीन भूतकाल में भी छोटे देशो के खिलाफ खतरनाक रहा है. वह भुगतान में नाकाम देशों पर अपनी शर्तें थोपता है. कई बार न चाहते हुए भी देशों को अपने आर्थिक दौरान बदलने के साथ ही चीन को अपने यहां टिकने की जमीन देने के लिए मजबूर हो जाता है. श्रीलंका के हालात इसका सबसे बड़ा उदारण है. कम्‍बोडिया, नाइजीरिया के साथ भी चीन ऐसा ही कर चुका है. भारत बीते एक दशक से मालदीव के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने से बच रहा है. इसका सीधा फायदा चीन को मिलता दिख रहा है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब भारत आए थे तब वे मालदीव और श्रीलंका होते हुए आए थे.

दोनों देशों में मैरीटाइम सिल्क रूट से जुड़े एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए लेकिन जब राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए तो इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी रही. चीन समेत श्रीलंका और मालदीव को पता था कि इस मामले में भारत का रवैया सकारात्मक नहीं है. इसके बावजूद मालदीव ने साल २०१४ के सितंबर महीने में इस तरह की संधियों पर हस्ताक्षर किए तो मालदीव का चीन की ओर झुकाव साफ दिखाई दे रहा था. भारत सरकार ने इस मामले में थोड़ी कोशिश ज़रूर की लेकिन इसे पुरज़ोर कोशिश नहीं कहा जा सकता. दक्षिण एशियाई देशों में भारत की स्थिति बढ़ते चीनी प्रभाव के सामने भारत कमजोर होता दिखाई पड़ रहा है. इन देशों की नज़र में मदद करने के वादे से लेकर असलियत में मदद पहुंचाने में चीन की गति भारत के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है.