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सिर्फ एक रात में ही ज्वालामुखी के उद्रेक से तबाह हुआ ये देश

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इंडोनेशिया के पूर्वी जावा पर सोमवार को माउंट आइजेन ज्वालामुखी में विस्फोट हो गया जिससे चारों तरफ जहरीली गैस फैल गई. इस विस्फोट से पांच हजार मीटर की ऊंचाई से राख और लावा निकलकर नीचे बहने लगा. इस जहरीली गैस से ३० लोग बीमार हो गए हैं. बिमार हुए लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. बीमार लोगों का इलाज किया जा रहा है. विस्फोट से अभी तक किसी भी प्रकार की हानी होने की कोई खबर नहीं है. नेशनल डिजास्टर मिटीगेशन एजेंसी के मुताबिक इससे अभी किसी जीवित हानि की पुष्टि नहीं हुई है. यह पहाड़ पर्यटकों में काफी मशहूर है.

प्रवक्ता सुतोपो पूरो नुग्रोहो ने कहा कि ज्वालामुखी का विस्फोट होने के कारण कई गांवों के दर्जनों निवासियों को पलायन करना पड़ा है. माउंट आइजेन आश्चर्यजनक सल्फर झील और रात के समय के सल्फर खनन के लिए जाना जाता है. यहां पर मजदूर कम वेतन पर खनन का खतरनाक काम करते है. सुतोपो ने कहा कि इजेन की शिखर अब अस्थायी रूप से गतिविधियों के लिए सीमाओं से बाहर है लेकिन ज्वालामुखी की समग्र स्थिति यहाँ सामान्य बन रही है. ज्वालामुखी फटने से कई किलोमीटर तक राख और लावा का बड़ा गुबार इक्कठा हो गया. इस ज्वालामुखी के गुबार से यहाँ के सभी लोग बुरी तरह डर गए और जोर-जोर से चिल्लाने लग गए. यह उनकी जिंदगी का बहुत ही डरावना पल था. इस गुबार को देस्ख कई लोग अपनी जान बचने के लिए भागने लगे.

ज्वालामुखी से उत्पन्न इस गुब्बार में राख के बड़े-बड़े टूकड़े होते हैं। जिसे लोगों को जान का खतरा रहता है. ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से पिछले ५ सालों में करीब ३० हजार लोगों को यहाँ से अपना घर छोडऩे की सलाह दी गई है. जो लोग पहाड़ों के पास रहते हैं उन्हें घर छोड़ने के लिए कहा गया है. इससे पहले साल २०१० में ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था इसमें २ लोगों की जान गई थी, उसके बाद साल २०१४ में विस्फोट हुआ था, जिसमें १६ लोग मारे गए थे. २०१४ के बाद २०१६ में भी यहाँ हुए ज्वालामुखी विस्फोट में ७ लोगों की जान गई थी. इंडोनेशिया में १२० से भी ज्यादा ज्वालामुखी है. यह ज्वालामुखी बाली पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. दुनिया भर से हर साल तकरीबन ५० लाख पर्यटक बाली घूमने आते हैं.

ज्वालामुखी एक पहाड़ होता है जिसके नीचे पिघले लावा की तालाब होती है. पृथ्वी के नीचे ऊर्जा पत्थर पिघलते हैं. जब जमीन के नीचे से ऊपर की ओर दबाव बढ़ता है तो पहाड़ ऊपर से फटता है और ज्वालामुखी कहलाता है. ज्वालामुखी के नीचे पिघले हुए पत्थरों और गैसों को मैग्मा कहते हैं. ज्वालामुखी के फटने के बाद जब यह निकलता है तो इसे लावा कहते हैं. ज्वालामुखी के फटने से गैस और पत्थर ऊपर की ओर निकल आते हैं. इसके फटने से लावा बहता है, साथ ही गर्म राख भी हवा के साथ बहने लगती है. ज्वालामुखी से निकलने वाली राख में पत्थर के छोटे छोटे कण होते हैं. इनसे चोट पहुंच सकती है और यह कांच जैसे होते हैं. बूढ़े लोगों और बच्चों के फेंफड़ों को इनसे नुकसान पहुंच सकता है.

दुनिया भर में करीब ५०० से भी ज्यादा सक्रिय ज्वालामुखी हैं. इनमें से आधे से ज्यादा रिंग ऑफ फायर का हिस्सा हैं. यह प्रशांत महासागर के चारों ओर ज्वालामुखियों के हार जैसा है. इसलिए इसे रिंग ऑफ फायर कहते हैं. हवाई में दुनिया के सबसे सक्रिय ज्वालामुखी हैं. इनमें से सबसे खतरनाक हैं मौना किया और मौना लोआ. ज्वालामुखी विस्फोट की बढ़ती घटनाओं का मौसम पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है. पहले तो इसका प्रकोप पश्चिमी देशों में ज्यादा था, पर इन गतिविधियों से अब एशियाई एशियाई देश भी प्रभावित हो चुके है. शोधकर्ताओं ने बताया कि ज्वालामुखी विस्फोट के कारण बहुत-से हानिकारक कण निकलते हैं, जो बहुत तेज गति से जाकर सौर ऊर्जा को खंडित कर देते हैं. इसके कारण आसपास का वातावरण काफी ठंडा हो जाता है.

इम्दोनेसिया के साथ ही दुनिया के कुछ अन्य देशों को भी ज्वालामुखी विस्फोट और उससे निकलने वाले हानिकारक वायु का खतरा सता रहा है. इस खतरे की वजह से सक्रीय ज्वालामुखियों के आसपास रहने वाले लोगों को बार बार स्थलांतर करने का आवाहन किया जाता है. लेकिन यहाँ के स्तःनीय लोग अपने घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. जापान तथा कुछ एनी एशियाई देशो में सक्रीय ज्वालामुखी बड़ी संख्या में मौजूद है जिससे वे इस खतरे की छाया में आते है. अमेरिका के हवाई में भी बड़े सक्रीय ज्वालामुखी मौजूद है. इन ज्वालामुखियो के आसपास के इलाकों को भूकंप तथा लावा का खतरा अधिक रहता है, और इस के साथ ही ज्वालामुखी से निकलने वाले राख और धुवे से सांस की तकलीफ भी हो सकती है. इस में कई लोगों की मौत भी हो चुकी है.

वर्तमान समय में दुनिया में सक्रिय ज्वालामुखियों की संख्या लगभग ५०० से भी अधिक है. इन ज्वालामुखियों में प्रमुख हैं, इटली का ‘एटना’ तथा ‘स्ट्राम्बोली’ जवालामुखी. स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी भूमध्य सागर में सिसली के उत्तर में लिपारी द्वीप पर स्थित है. इसमें सदा प्रज्वलित गैस निकला करती है, जिससे आसपास का भाग प्रकाशित रहता है. और इस वजह से यह सक्रिय ज्वालामुखी ‘भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ’ कहा जाता है. कुल सक्रिय ज्वालामुखी का अधिकांश प्रशान्त महासागर के तटीय भाग में पाया जाता है. इसी लिए प्रशान्त महासागर के परिमेखला को ‘अग्नि वलय’ भी कहा जाता है. सबसे अधिक सक्रिय ज्वालामुखी अमेरिका एवं एशिया महाद्वीप के तटों पर स्थित हैं. विश्व की सबसे ज्यादा ऊँचाई पर स्थित सक्रिय ज्वालामुखी ‘ओजस डेड सालाडो’ (६८८५ मीटर) एण्डीज पर्वतमाला में अर्जेन्टीना–चिली देश की सीमा पर स्थित है.