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अरब देशों में आया ये अबतक का सबसे बड़ा संकट, खतरे में पूरी दुनिया

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दुनिया के मिडिल ईस्ट  देशो के बढ़ते तनाव को रोकना अब मुश्किल होता जा रहा है.देशों देशों में बढ़ता ये विवाद अप्रत्यक्ष्य रूप से  आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है.यदि इस बढ़ते नफरत पर सही निर्णय नहीं लिया जाए,तो पूरी दुनिया के लिए यह टाइम बम की घडी बन जाएगी.जो कभी भी युद्ध के रूप में सामने आ सकती है.

दिन ही दिन मिडिल  ईस्ट देशों में खतरा बढ़ता ही जा रहा है.इ बढ़ते विवादों को देख ऐसा लगता है की कई तीसरा युद्ध न हो जाए.मिडिल ईस्‍ट में लगातार बढ़ती नफरत किसी भी वक्‍त बड़े युद्ध का रूप ले सकती है.इसी वजह से पुरे दुनिया के लिए खतरा बना है.यहाँ की बढती नफरत देख धार्मिक कट्टरवाद, आतंकवाद का साथ और अपने निजी हित हैं.आलम ये है कि मौजूदा समय में मिडिल ईस्‍ट में शामिल 18 देशों में ज्‍यादातर देश एक दूसरे को नामपसंद करते हैं. इन सभी 18 देशों में शांति की बात होनी चाहिए .इन सभी १८ देशों में शांति की बात होना मौजूद समय होना मुश्किल है.इसके कारण पुरे दुनिया में लगातार खतरे की घंटी बज रही है.इस वक्त मौजूदा समय में मिडिल ईस्ट में शामिल १८ देशों में ज्यादा तर देश एक दुसरे को नापसंद करते है.

 

मिडिल ईस्‍ट में शामिल 18 देशों में बहरीन, साइप्रस, मिस्र, ईरान, इराक, इजरायल, जोर्डन, कुवैत, लेबनान, उत्तरी साइप्रस, ओमान, फिलिस्‍तीन, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, तुर्की, यूएई, और यमन हैं.मौजूदा परिस्थितियों में इजरायल, ईरान को पसंद नहीं करता है. इराक, सीरिया को नापसंद करता है, सीरिया तुर्की को पंसद नहीं, तुर्की से इजरायल का छत्तीस का आंकड़ा है. फिलिस्‍तीन भी इजरायल को पसंद नहीं करता है. कुवैत, इराक से नफरत करता है. लेबनान, ओमान और जोर्डन में आतंकवाद की जड़े बड़ी गहरी हैं.इसीलिए ये देश आपस में ही एक दुसरे के लिए पीढ़ा बन चुके है. इसलिए ये दूसरे देशों के आंखों की किरकिरी बने हुए हैं.यूएई को यदि छोड़ दें तो ये बेहद साफ है कि यहां की आबोहवा में शांति और यहां फैली आपसी नफरत को फिलहाल तो ख़त्म करने का तरीका नहीं पता.

 

तेलों का उत्पादन करनेवालों दुनिया के अहम देशो का समावेश मिडिल ईस्ट की देशों में आता है,जिन्हें ओपेक देश कहा जाता है.तेल उत्पादन करे वाले ये देश सही मायनों में दुनिया के कई देशों को चलाते है.तेल का उत्पादन होने के कारण दुनिया की अर्थव्यवस्था इनसे प्रभावित है. इनमें ईरान, इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई का नाम शामिल है. तेल के व्‍यापार के नाम पर ये देश भले ही एकजुट दिखाई देते हों लेकिन इसके उलट इनमें भी एकजुटता नहीं है.इस क्षेत्र में शामिल देशों के बीच निजी हितों को लेकर हमेशा टकराव बना रहता है. इसका उदाहरण मौजूदा समय में इजरायल और तुर्की, तुर्की और सीरिया, सीरिया और सऊदी अरब, ईरान और इजरायल, फिलिस्‍तीन और इजरायल के बीच का तनाव है.बढ़ते तनाव के साथ खतरे की घडी भी बढ़ रही है.

मिडिल ईस्ट के सभी देश अब टाइम बम की तरह है.तनाव के ऐसे माहौल मैं भी कई देश कुछ मुद्दों पर सुर मिलते दिख रहे है.जैसे सीरिया के मुद्दे पर सऊदी अरब, तुर्की और इजरायल एक साथ हैं. ईरान के मसले पर भी ये साथ दिखाई देते हैं.फिलिस्‍तीन और येरुशलम के मुद्दे पर ज्‍यादातर मुस्लिम देश इजरायल के खिलाफ हैं. मिडिल ईस्‍ट में शामिल इन देशों की नफरत किसी टाइम बम की टिक-टिक करती उस घड़ी की तरह है जो कभी भी अपने समय पूरा करने पर फट सकती है. यही हाल मिडिल ईस्‍ट का भी है. यह पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है. यदि यहां की लगातार बढ़ रही नफरत को यदि न रोका गया तो यह किसी भी वक्‍त बड़े युद्ध को न्‍योता दे सकती है.

 

मिडिल ईस्ट देशों में बढ़ता तनाव में अमेरिका का भी बड़ा हाथ माना जायेगा.मिडिल ईस्ट के देशों में फैली नफरत की एक बड़ी वजह अमेरिका का निजी हित भी है.अमेरिका की वर्षों से मिडिल ईस्‍ट को लेकर एक दूसरी ही नीति और नीयत रही है. इस नीति और नियत का ही परिणाम पूरी दुनिया ने 1990-1991 के खाड़ी युद्ध के रूप में देखा था. इसमें अमेरिका ने कुवैत का साथ दिया था. इस युद्ध का मकसद हकीकत में इराक के राष्‍ट्रपति सद्दाम हुसैन को हटाना था. जानकार भी सीरिया में चल रहे गृह युद्ध की बड़ी वजह अमेरिका की वहां दखलंदाजी को मानते हैं. इसके अलावा ईरान से फैली नफरत के पीछे भी अमेरिका की यही नीति काम कर रही है जिसके तहत वह सऊदी अरब से संबंध मजबूत कर रहा है और उसको ईरान के खिलाफ भड़का रहा है.

 

तीसरे मोर्चे पर अमेरिका के इजरायल से लगातार मजबूत रिश्‍ते होते हुए दिख रहे थे लेकिन अब यहां पर भी नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं. अब अमेरिका और इजराइल के बिच भी दरारे पड़ गई है .इस बात का अफ़सोस है कि लीबिया में गद्दाफी को हटाने और इराक से सद्दाम को हटाने के बाद से ही वहां आतंकवाद हावी हो गया जिसने सीरिया समेत सऊदी अरब, कुवैत, को अपनी चपेट में लिया. अब मौजूदगी स्थिति में शांत रहना अब बेकाबू है. इसके बाद यहां से पनपे आईएस इस्‍लामिक स्‍टेट ने तुर्की, से लेकर बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, लंदन में अपना कहर बरपाया है. इस वर्ष आईएस के कराए कई हमलों की गूंज यूरोप से लेकर मिडिल ईस्‍ट तक सुनी गई है. यदि यहां की लगातार बढ़ रही नफरत को यदि न रोका गया तो यह किसी भी वक्‍त बड़े युद्ध को न्‍योता दे सकती है