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चीनियों ने मोदी को लेकर ऐसा क्या किया है की मोदीजी भी भौचक्क है

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में आए चार साल से ज्यादा का समय बीत चुका है. ऐसे में भारत ही नहीं कई देशों की मीडिया में उनके कार्यकाल की समीक्षा की जाने लगी है. इसी क्रम में पड़ोसी देश चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने आर्थिक सुधार को मोदी गवर्नेंस का अहम पहलू बताया है.

गुरुवार को अखबार में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक तेज आर्थिक विकास और देश के कई राज्यों में हुए चुनावों में बीजेपी की शानदार जीत के कारण नरेंद्र मोदी को आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जा रहा है. हालांकि विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. नैशनल डिवेलमेंट ऐंड रिफॉर्म कमिशन में इंटरनैशनल कोऑपरेशन सेंटर के असोसिएट रिसर्चर माओ कीजी ने लिखा है कि चार साल के कार्यकाल के बाद भी भारत में यह सवाल पूछा जा रहा है, ‘क्या मोदी भारत के लिए अच्छे हैं?’

ऐसे में पक्ष और विपक्ष में बहस भी हो रही है. लेख में नोबल पुरस्कार विजेता और अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का भी जिक्र किया गया है. आपको बता दें कि हाल में सेन ने अपनी नई पुस्तक ‘भारत और उसके विरोधाभास’ पर चर्चा के दौरान कहा था, ‘चीजें बहुत खराब हो गई हैं/ इस सरकार (मोदी सरकार) के आने के पहले से ही चीजें बिगड़ गई थीं.

हमने शिक्षा और स्वास्थ्य में पर्याप्त काम नहीं किया है और २०१४ के बाद से इन क्षेत्रों को लेकर हम गलत दिशा की ओर बढ़े हैं.’ भारत में अगले आम चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है. ऐसे में यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और उनकी नीतियों को लेकर भारतीयों की क्या राय है क्योंकि इसी पर देश का भविष्य निर्भर है. लेख में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर पैदा हुए विवाद प्रमुख तौर पर राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक रहे हैं.

इससे उनकी छवि हार्डलाइन हिंदुत्व अजेंडा को आगे बढ़ानेवाले नेता की बनी है. हालांकि इनमें से कोई भी मसला उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि आर्थिक मुद्दा. लेख में कहा गया है कि नारों और राजनीतिक विरोधियों के आरोप-प्रत्यारोप से अलग आर्थिक मसले ही ऐसे हैं जो उद्देश्य को पूरा करने वाले नतीजे सामने रखते हैं.

मोदी के सामाजिक और राजनीतिक अजेंडा पर हुए विवादों के बीच आर्थिक विकास ही है जो साफतौर पर दिखाई दे रहा है. यही वजह है कि इस पर ज्यादा चर्चा होती है. ऐसे में सवाल यह है कि जब इंडिकेटर्स से अर्थव्यवस्था के आंकड़े सामने आ रहे हैं तो विवाद क्यों हैं? लेख में इसका जवाब भी दिया गया है- मोदी की आर्थिक नीतियों के फायदे को एकसमान रूप से नहीं लिया जा रहा है.

कुछ लोगों को GST जैसे सुधारों और नोटबंदी के दीर्घकालिक फायदे पर संदेह है जबकि इससे अर्थव्यवस्था कुशल और व्यवस्थित हुई है. हालांकि सुधारों के चलते ‘इकनॉमिक ब्लैकआउट्स’ और समाज में उथल-पुथल से विरोध का मौका जरूर मिल गया. लेख में कहा गया है कि नुकसान फौरन दिखाई देता है जबकि फायदे मिलने में समय लगता है.

इसी वजह से अविश्वास और संदेह पैदा होता है. GST सुधार और नोटबंदी को एक साल से ज्यादा हो गया और कुछ फायदे अब सामने आ रहे हैं. हाल में IMF की एक रिपोर्ट में भी इन सुधारों का जिक्र किया गया है. इसमें भारतीय अर्थव्यवस्था के २०१८ में ७.४ पर्सेंट और २०१९ में ७.८ पर्सेंट रहने की संभावना जताई गई है.

लेबर रेग्युलेशन, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़े सुधार भारत को आगे बढ़ा सकते हैं. इससे लेबर इंडस्ट्रीज को फायदा होगा और कुछ हद तक ये मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ पहल को भी आगे बढ़ाते हैं. लेख में कहा गया है कि वैसे तो इससे होनेवाला लाभ पूरे समाज को होगा लेकिन भूमि मालिक समेत कुछ चुनिंदा समूहों के लिए यह सब बुरा हो सकता है. यही वजह है कि विरोध दिखाई देता है.