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पूरी दुनिया हो सकती है तबाह, इस देश ने खुल्ले में दी है, ये चेतावनी

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सऊदी अरब और ईरान के बिच की दूरियाँ पूरी दुनिया जानती है. इन दोनों देशो में चल रहा संघर्ष अब बढ़ता ही जा रहा है. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी  के बिच आये दिन एक दुसरे को चेतावनिया देने की बात आम है. हाल ही में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा है की यदि ईरान नुक्लेअर बम विकसित करता है तो सऊदी अरब भी वैसा ही करेगा. उन्होंने कहा कि सऊदी अरब परमाणु बम हासिल नहीं करना चाहता, लेेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर ईरान परमाणु बम बनाएगा, तो हम भी जल्द से जल्द उसका अनुसरण करेंगे.

सऊदी अरब के प्रिंस ने एक टीवी चैनेल से बातचीत की. और इस बातचीत के दौरान उन्होंने यह बयान दिया है. शाहजादा सलमान ने यह वक्तव्य सीबीसी दिस मॉर्निंग के को-होस्ट नोह ओ डोनेल को दिए गए साक्षात्कार के दौरान दिया. सीबीएस से हुई इस बातचीत में क्राउन प्रिंस सलमान ने ईरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्ला अली खामनेई की तुलना एडोल्फ हिटलर से की है. अपनी अमेरिका यात्रा से पहले शाहजादा ने खामनेई की तुलना हिटलर से करने का कारण भी स्पष्ट किया है. वजह बताते हुए प्रिंस ने ओ डोनेल से कहा कि वह विस्तार चाहते हैं.वह पश्चिम एशिया में अपना वैसा ही प्रोजेक्ट तैयार करना चाहते हैं, जैसा विस्तार उस समय हिटलर करना चाहता था. दुनिया और यूरोप के बहुत से देशों को हिटलर के खतरनाक होने का अहसास तक नहीं हुआ था.

और जब लोगों को हिटलर के असली रूप का अहसास हुआ, तब तक वह सब कुछ घटित हो चुका था. मैं नहीं चाहता की पश्चिम एशिया में वैसा कुछ हो. अमेरिका, दक्षिण कोरिया, रूस, फ्रांस और चीन ने सऊदी अरब के पहले दो न्यूक्लियर रिऐक्टर्स तैयार करने के मल्टिबिलियन डॉलर टेंडर में रूचि दिखाई है. दुनिया के सबसे बड़े ऑयल एक्सपोर्टर ने पहले कहा था कि वह शांति पूर्ण कार्यों के लिए न्यूक्लियर टेक्नॉलजी विकसित करना चाहता है, लेकिन उन्होंने यह बात साफ नहीं की कि क्या वह न्यूक्लियर फ्यूल का निर्माण करने के लिए यूरेनियम भी विकसित करना चाहता है. इस प्रक्रिया का इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में भी किया जा सकता है. सरकार ने मंगलवार को परमाणु ऊर्जा परियोजना के लिए नैशनल पॉलिसी को भी मंजूरी दे दी है.

इसमें सभी परमाणु गतिविधियों को शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए इस्तेमाल की भी बात कही गई है. रिएक्टरों को पांच प्रतिशत शुद्धता के साथ यूरेनियम की समृद्धता की आवश्यकता होती है, लेकिन इस प्रक्रिया में यही तकनीक इस्तेमाल की जाती है. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने कहा है “ईरान हमारा कोई प्रतिद्वंदी नहीं है. उसकी आर्मी मुस्लिम देशों की टॉप ५ सेनाओं में नहीं है. सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था ईरान से बहुत अधिक है.” प्रिंस के मुताबिक, “सऊदी अरब के बराबर आने में ईरान बहुत पीछे है. लेकिन वह हिटलर की तरह अपना विस्तार करना चाहता है. वह मध्य पूर्व में अपने प्रोजेक्ट लगाना चाहता है.” जुलाई, २०१५ में सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के पांच स्थायी सदस्यों, जर्मनी और ईरान में ज्वाइंट कंप्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीए) समझौता हुआ था.

इस समझौते के तहत ईरान आर्थिक मदद और खुद पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने के बदले अपने परमाणु हथियार कार्यक्रमों को रोकने पर राजी हुआ था. अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साल २०१७ में इस समझौते को रद्द करने की बात कही थी. लेकिन इस पर ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने यह आरोप लगाया है कि अपने तरीके से परमाणु समझौता करने के लिए ट्रंप यूरोपीय देशों पर दबाव बना रहे हैं. यह बात किसी को नहीं पता है कि सऊदी अरब ने कभी खुद का परमाणु कार्यक्रम स्थापित करने की कोशिश की है या नहीं लेकिन ऐसी खबरें कई बार मिलीं है कि उसने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के कार्यक्रम में निवेश किया है.

साल २०१३ में इसरायल की खूफिया सेना के पूर्व प्रमुख अमोस यादलिन ने स्वीडन में एक सम्मेलन में कहा था की ”अगर ईरान परमाणु बम बना लेता है तो सऊदी अरब को परमाणु बम प्राप्त करने में एक महीने का भी वक्त नहीं लगेगा, वे पहले से ही इन बमों के लिए निवेश कर रहे हैं, वे पाकिस्तान जाएंगे और जो भी हथियार उन्हें चाहिए वो ले आएंगे.” ईरान ने भी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं, और वह लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण पहल के लिए है. किन्तु साल २०१५ में उसे अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करना पड़ा, उस समय तमाम देशों ने शक़ और आशंका जताई थी कि ईरान परमाणु कार्यक्रम के तहत परमाणु हथियारों का निर्माण कर रहा है.

उस समय इस समझौते को तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की एक बड़ी जीत बताया गया था लेकिन बाद में डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि यह अभी तक का सबसे बेकार समझौता है. अमेरिका के पूर्व गृह मंत्री रेक्स टिलरसन इस समझौते के समर्थन में थे किन्तु उनकी जगह लेने वाले माइक पोम्पो का मानना है कि इस समझौते को खत्म कर देना चाहिए. जनवरी में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर लगे प्रतिबंधो में कुछ कमी की थी लेकिन तब भी उनका कहना था कि वे ऐसा अंतिम बार कर रहे हैं. यूरोपीय देश ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनि ने ट्रंप से अपील की है कि वे ईरान के साथ हुए समझौते को जारी रखें. ईरान और सऊदी अरब दोनों ही देश काफी ताकतवर है और इन दोनों में क्षेत्रीय प्रभुत्व पर लड़ाई चल रही है.