Home देश भारत की रक्षा के लिए दान किया पांच टन सोना

भारत की रक्षा के लिए दान किया पांच टन सोना

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दुनिया में उस मुल्क की सरहदों को कोई नहीं छू सकता जिस मुल्क के लोग मुसीबतों को देखकर सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हो.यह बात भारत के एक दौर की याद दिलाती है जब हिन्द के दौर पर विदेशी ख़तरा बढ़ गया था.उस वक्त एक निजाम ने प्रधानमंत्री के कहने पर अपना पूरा खजाना भारत की रक्षा के लिए खुला कर दिया था.इस महान शख्स का नाम था मीर ओस्मान अली.उस वक्त यह महान शख्स हैदराबाद के निजाम थे.

पैसों के मामले में भारतीय सेना को दान शायद ही किसी ने दिया हो.तो इस सारे किस्से की कहानी आगे देखने जा रहे है.मीर ओस्मान अली हैदराबाद रियासत के अंतिम निजाम थे.उस वक्त वो विश्व के धनिक व्यक्तियों में शामिल थे.उनकी उस वक्त की सम्पति अमेरिका के अर्थव्यवस्था की दो प्रतिशत थी.

इतनी संपत्ति होने के कारण उस वक्त उनकी टाइम मैगज़ीन के फ्रंट पर फोटो लगवाई गई थी.उनकी संपत्ति की इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है की वे पांच करोड़ पौंड कीमत वाले एक हिरे को पेपरवेट के तौर पर इस्तेमाल करते थे.वही उस पैलेस पर करीब ६००० लोग काम किया करते थे.उनमे से ३८ लोग मोंबत्ती स्टैंड की धूल साफ़ किया करते थे.इतना सबकुछ होने के बावजूद वो साधारण तरीके से अपना जीवन व्यतीत करते थे.

कहा जाता है की उन्होंने अपनी पूरी जीवन में एक ही टोपी और एक ही कम्बल पर जिंदगी चला ली.वे तो हमेशा साधारण जीवन से भी ऊपर थे.उन्होंने बनारस विश्वहिंदू के लिए आर्थिक मदद मांगने के तुरंत बाद बिना हिचकिचाते एक लाख की मदद की.१९६५ में भारत पाकिस्तान से युद्ध जित चुका हुआ था.

पाकिस्तान से युद्ध जिंकने पर पुरे देश में जश्न का माहौल था.भारत उनकी जित का ठीक से जश्न मना ही पाए क्यूंकि अचानक उनके सामने चीन का खतरा उभर कर आया.तिब्बत को आजाद कराने के लिए चीन ने भारत को दादागिरी दिखानी शुरू की.इतना ही नहीं तो युद्ध तक की धमकी दे डाली।भारत इससे चिंतित हो उठा.क्यूंकि भारत इससे पहले भयावह परिस्तिथि से गुजर उठा था.पहले युद्ध में जित हुई थी लेकिन दूसरा युद्ध अचानक से आना उचित नहीं था.

उधर चीन की सेना युद्ध के लिए पूरी तैयारी से खड़ी थी.लेकिन यहाँ सैनिकों के हाथ खाली थे.वही देश विभाजन का दर्द भी चल रहा था.वही पकिस्तान के हुए युद्ध के कारण सरकार के पास धन की कमी थी.इसीलिए उस वक्त के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने धन के लिए रक्षा कोष की स्थापना की.

लालबहादुर शास्त्री जी ने लोगों से दान करने की अपील की.इसके कारन लोगों को देशभावना से जाग दिया।वो देशसेवा के लिए टूट पड़े.यहाँ तक की आम लोग जितना हो सके उतना करने की कोशिश कर रहे थे.जिसके पास पैसे नहीं थे वे भोजन और कपडे दान कर रहा था.यहाँ तक की लोग रक्तदान करने के लिए उमड़ पड़े.जिसके कारण सैनिकों के इलाज में मदद मिल सके.लेकिन उस समय यह सब युद्ध के लिए काफी नहीं था.

 

लालबहादुर शास्त्री ने रेडियो द्वारा राजेरजवाड़ों से मदद के लिए अपील की.शास्त्री जी के इस अपील को हैदराबाद के निजाम भी सुन रहे थे.लिहाजा उन्होंने इस मामले में मदद करने के लिए मन बनाया।उन्होंने शास्त्री जी को दिल्ली से हैदराबाद आने का निमंत्रण भेज दिया। सेना को मदद की जरुरत होने के कारन शास्त्री जी ने किसी देरी के बिना हैदराबाद पहुंचे।

निजाम उस्मान अली ने हैदराबाद के एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया। शास्त्री जी जानते थे की हैदराबाद में उनको निराशा नहीं मिलेगी।इसीलिए शास्त्री जी ने निजाम से तुरंत बात की और उनको स्थिति का लिहाजा दिया.उस्मान अली इसके लिए पहले ही तैयार थे.बिना किसी देरी के निजाम अली ने अपना खजाना भारत की रक्षा के लिए खोल दिया।उन्होंने राष्ट्रीय रखाकोश के लिए पांच टन सोना देने का ऐलान किया।

उस्मान अली ने सोने के बक्से एयरपोर्ट पर मंगवाए।पहले एक बाद में दो ऐसे देखते देखते कई बक्से उन्होंने ने शास्त्री जी के सामने रख दिए.उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा की यह सोना में भारत की रक्षा के लिए दान कर रहा हु और इसे स्वीकार करे.निडर होकर जंग लड़े। शास्त्री जी ने ५ टन सोना लेकर दिल्ली की तरफ रवाना हो गए.यह खबर पहले मीडिया तक पहुंची और बाद में देश में फ़ैल गयी.हर किसी ने उस्मान अली की तारीफ़ की.यहाँ तक की विदेशी मीडिआ ने भी इसे कवर किया।