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9/11 हमले को लेकर US ने इस मुल्सिम देश को दे डाली ये बड़ी चेतावनी

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अमेरिका पर हुए ९/११ के आतंकी हमले को दुनिया आज तक नहीं भूल पायी है. यह दुनिया पर हुए सबसे भयानक आतंकी हमलो में से एक माना जाता है. इस मामले में अमेरिका का कहना था की हमलावर आतंकियों को सऊदी अरब की तरफ से मदत मिली थी. इसी बात को लेकर मुकदमा आज भी चल रहा है. ११ सितम्बर २००१ को हुए इस हमले में कोई भी सम्बन्ध होने से सऊदी अरब ने साफ़ इनकार कर दिया है. अमेरिका ने इस मुक़दमे को जारी रखने के आदेश दे दिए है. व‌र्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए इस हमले में करीब तीन हजार लोगों की जान चली गई थी.

सऊदी सरकार पर इस हमले में शामिल आतंकियों की मदद करने का आरोप अमेरिका ने लगाया है. पीडि़त परिवारों ने हर्जाने के लिए सऊदी सरकार पर केस किया है. सऊदी सरकार हालांकि इस आरोप से इन्कार करती रही है. सऊदी सरकार ने मैनहट्टन की संघीय अदालत में चल रहे मुकदमे को खारिज करने के लिए अपील दर्ज की थी. जिला जज जॉर्ज डेनियल्स ने बुधवार को यह अपील खारिज कर दी है. जज ने कहा है की ‘अभियोजकों के आरोप पर्याप्त कारण पर आधारित हैं. इसलिए जस्टिस अगेंस्ट स्पांसर ऑफ टेररिज्म एक्ट (जास्टा) के तहत सऊदी अरब पर मुकदमा जारी रखा जाना चाहिए’. सितंबर, २०१६ में राष्ट्रपति बराक ओबामा के वीटो पावर को निरस्त कर अमेरिकी संसद ने जास्टा लागू कर दिया था. ओबामा इस कानून के विरोध में थे.

उनका कहना था कि इससे अन्य देशों में अमेरिकी कंपनियों, सैनिकों और नागरिकों पर मुकदमे दायर हो सकते हैं. जज डेनियल्स ने अपने आदेश में आगे कहा, अभियोजकों को कैलिफोर्निया स्थित मस्जिद के इमाम फहद अल ठुमैरी और खुफिया अधिकारी उमर अल बयूमी के संदिग्ध कार्यों में सऊदी अरब की भूमिका को साबित करने का मौका मिलना चाहिए’ इन दोनों पर हमले में शामिल विमानों को हाईजैक करने वाले आतंकियों की मदद और हमले की साजिश रचने के आरोप थे. इस बिल का नाम जस्टिस अगेंस्ट स्पॉन्सर्स ऑफ़ टेररिज्‍म एक्ट को अब अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा. अगर ये बिल कानून बन जाता है तो हमले के पीड़ितों के परिवार सऊदी सरकार के किसी भी ऐसे सदस्य के खिलाफ केस कर सकेंगे जिनकी इन हमलों में भूमिका मानी जा सकती है.

सऊदी अरब ने २००१ में हुए इन आतंकी हमलों के पीछे अपनी किसी तरह की भूमिका से इनकार करता है. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हुए हमले में क़रीब ३००० लोगों की मौत हुई थी. हमले के शामिल १९ हाइजैकर्स में से १५ सऊदी के नागरिक थे. हालांकि साल २००४ में ९/११ आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि सऊदी सरकार ने हमलों में शामिल लोगों को किसी तरह की कोई मदद की थी. अमेरि‍का के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा को इस बात की कोई उम्मीद नहीं कि निचले सदन में मौजूद सीनेटर्स इसे कानून बनने देंगे. वहीं सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने चेतावनी दी है कि इसके नतीजे में सऊदी सरकार अमेरिका में अपने निवेश से हाथ खींच सकती है.

एक रिपोर्ट में कहा गया है की ९/११ हमला करने वाले कुछ आतंकियों को सऊदी सरकार से समर्थन मिला हुआ था. इस डॉक्यूमेंट को ‘२८ पेजेस’ का नाम दिया गया है. यह गोपनीय दस्तावेज सितंबर २००१ में हुए हमले के बाद कांग्रेस द्वारा की गई ज्वाइंट इंक्वायरी का हिस्सा हैं. यह दस्तावेज असल में २९ पन्नों का है. क्योंकि इसमें एक पन्ने पर तत्कालीन CIA डायरेक्टर जॉर्ज टीनेट की चिट्ठी को भी शामिल किया गया है. दस्तावेजों के मुताबिक ११ सितंबर २००१ को अमेरिका पर आतंकी हमला करने वालों में से कुछ आतंकी लगातार सऊदी के नेताओं के संपर्क में थे. साथ ही उन्हें हमला करने के लिए सऊदी अरब से मदद भी दी गई थी. इतना ही नहीं दस्तावेजों के मुताबिक अमेरिका में रह रहे सऊदी के अधिकारियों का अल-कायदा और अन्य आतंकी संगठनों से भी रिश्ते हैं.

इस घटना ने पूरी दुनिया में बहुत कुछ बदल दिया.चरमपंथ को लेकर अमरीकी नीति में बदलाव और भविष्य की योजनाओं पर बोस्टन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ हुसैन हक़्क़ानी की राय है की “भले ही अमरीका में ९/११ के बाद उतना बड़ा हमला नहीं हुआ लेकिन पूरी दुनिया में अब भी चरमपंथ है. दुनिया में कई जगह चरमपंथी हमले हुए हैं. अमरीका में अब वो माहौल नहीं रहा जो ९/११ के तुरंत बाद था. बहुत से अमरीकी कहते हैं कि ‘दो जंगे इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में बग़ैर किसी वजह ही लड़ ली.’ इससे अमरीका को बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है. जहां तक दुनिया की बात है तो अमरीका कई सारे देशों को चरमपंथियों का समर्थन करने से रोक नहीं पाया और ना ही चरमपंथ को पूरी तरह से ख़त्म कर पाया है.

इस्लामिक स्टेट (आईएस) सारे मुसलमानों को ना सही, लेकिन जिन थोड़े-बहुत मुसलमानों को अपनी गिरफ्त में लेने में कामयाब हुए है, उसकी बदौलत वो दुनिया में कई जगह चरमपंथी वारदातों को अंज़ाम देने में कामयाब हो रहा है. इसकी वजह से ख़ुद मुसलमानों को बहुत नुकसान हो रहा है. चरमपंथ की वजह से दुनिया में मारे गए लोगों में मुसलमानों की संख्या ही सबसे ज्यादा है. अमरीका जैसी अंतरराष्ट्रीय ताकतों को इसमें पूरे मन से दिलचस्पी लेनी होगी, नहीं तो दुनिया के कई हिस्सों में चरमपंथ के जज़ीरे (टापू) बन जाएंगे और इससे चरमपंथ पूरी दुनिया में फैलेगा.दो जंग लड़ने के बाद अमरीका ने सबक लिया कि ख़ुद सामने से जाकर भिड़ने की जगह संबंधित देशों की नीतियों को बदला जाए. चरमपंथ की वजह से दुनिया में कई जगह मुसलमानों को लेकर एक नापसंद करने का रवैया कई लोगों में देखा गया है. इसकी आड़ में कुछ लोग इस्लाम के ख़िलाफ़ प्रौपेगेंडा करने में भी कामयाब हो गए हैं.